Dr. Nikunj Jain
Co-Founder and HOD - Nuclear Medicine ,MBBS, DRM, DNB, FEBNM, FANMB, Dip. CBNC
पेनाइल कैंसर एक दुर्लभ प्रकार का कैंसर है, जो पुरुषों के लिंग के ऊतकों में विकसित होता है। इस कैंसर के ज्यादातर मामले स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा होते हैं, जो लिंग की बाहरी परत में मौजूद कोशिकाओं से शुरू होते हैं। पेनाइल कैंसर का समय पर पता चलने पर इसका इलाज संभव हो सकता है।
पेनाइल कैंसर के लक्षण कई तरह के हो सकते हैं, जैसे लिंग की त्वचा में बदलाव, गांठ, घाव, खून आना, सूजन या असामान्य स्राव। इन लक्षणों को हमेशा कैंसर नहीं माना जाता, क्योंकि संक्रमण और दूसरी गैर-कैंसर वाली समस्याओं में भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं। लेकिन अगर कोई बदलाव लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर से जांच करवाना जरूरी है।
मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में उपलब्ध जांच और इमेजिंग सेवाएं डॉक्टरों को जरूरत के अनुसार बीमारी की जांच और कैंसर की स्टेजिंग में मदद कर सकती हैं। इस ब्लॉग में हम पेनाइल कैंसर के लक्षण, पेनाइल कैंसर के कारण, पेनाइल कैंसर के प्रकार और पेनाइल कैंसर में PET-CT की भूमिका के बारे में विस्तार से समझेंगे।
पेनाइल कैंसर क्या होता है?
पेनाइल कैंसर तब होता है जब लिंग के ऊतकों में मौजूद कुछ कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। यह कैंसर लिंग के अलग-अलग हिस्सों में हो सकता है, लेकिन अक्सर यह ग्लांस या फोरस्किन के आसपास विकसित होता है। कभी-कभी कैंसर फोरस्किन के नीचे विकसित हो सकता है और शुरुआत में आसानी से दिखाई नहीं देता। इसलिए लिंग की त्वचा या बनावट में लंबे समय तक रहने वाले किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
पेनाइल कैंसर के लक्षण
पेनाइल कैंसर के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। कैंसर की जगह और उसकी अवस्था के आधार पर लक्षणों की गंभीरता भी अलग हो सकती है। आम लक्षणों में शामिल हैं:
कुछ मामलों में कैंसर फोरस्किन के नीचे छिपा हो सकता है, खासकर जब फोरस्किन बहुत तंग हो। इनमें से किसी भी लक्षण का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर ही है। संक्रमण, सूजन और त्वचा से जुड़ी दूसरी समस्याएं भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकती हैं। लेकिन अगर कोई घाव, गांठ या त्वचा में बदलाव ठीक नहीं हो रहा है, तो डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए।
पेनाइल कैंसर के कारण और जोखिम कारक
पेनाइल कैंसर का हमेशा कोई एक निश्चित कारण नहीं होता। हालांकि, कुछ स्थितियां और आदतें इस कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती हैं। पेनाइल कैंसर के कारण और जोखिम कारकों में कुछ प्रकार के HPV संक्रमण, धूम्रपान या तंबाकू का सेवन, फोरस्किन का बहुत तंग होना, बढ़ती उम्र, जननांगों की साफ-सफाई की कमी और कुछ यौन स्वास्थ्य से जुड़े कारक शामिल हो सकते हैं।
HPV यानी ह्यूमन पैपिलोमावायरस पेनाइल कैंसर का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के अनुसार, पेनाइल कैंसर के लगभग एक-तिहाई मामलों का संबंध HPV से हो सकता है। किसी जोखिम कारक का मौजूद होना यह नहीं बताता कि व्यक्ति को कैंसर ज़रूर होगा। इसी तरह, जोखिम कारक न होने पर भी कैंसर हो सकता है।
पेनाइल कैंसर के प्रकार
पेनाइल कैंसर के कई प्रकार हो सकते हैं। इनमें सबसे आम प्रकार स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा है। इसके अलावा इसके कुछ अलग उपप्रकार भी होते हैं।
स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा
यह पेनाइल कैंसर का सबसे आम प्रकार है। यह लिंग की सतह पर मौजूद स्क्वैमस कोशिकाओं से शुरू होता है।
वेरुकस कार्सिनोमा
यह स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का एक कम आम और आमतौर पर धीरे बढ़ने वाला प्रकार है। इसमें त्वचा पर मस्से जैसी वृद्धि दिखाई दे सकती है।
वार्टी कार्सिनोमा
इस प्रकार के कैंसर में वृद्धि का आकार अक्सर मस्से जैसा दिखाई दे सकता है। यह स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का एक कम आम उपप्रकार है।
बेसालॉइड कार्सिनोमा
यह भी स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का एक उपप्रकार है। कुछ मामलों में यह अन्य उपप्रकारों की तुलना में अधिक आक्रामक व्यवहार कर सकता है और इसका संबंध HPV से भी हो सकता है। पेनाइल कैंसर के कुछ दुर्लभ प्रकार भी हो सकते हैं। कैंसर का सही प्रकार जानने के लिए आमतौर पर बायोप्सी से प्राप्त ऊतक की जांच की जाती है।
पेनाइल कैंसर की जांच कैसे होती है?
पेनाइल कैंसर की जांच आमतौर पर डॉक्टर द्वारा शारीरिक जांच और मरीज के लक्षणों तथा स्वास्थ्य इतिहास को समझने से शुरू होती है। डॉक्टर लिंग पर किसी गांठ, घाव, त्वचा में बदलाव या अन्य असामान्य हिस्से की जांच करते हैं। कमर के आसपास की लिम्फ नोड्स की भी जांच की जा सकती है।
अगर किसी हिस्से पर कैंसर का संदेह हो, तो बायोप्सी की सलाह दी जा सकती है। इसमें असामान्य हिस्से से ऊतक का छोटा नमूना लिया जाता है और माइक्रोस्कोप से उसकी जांच की जाती है। बायोप्सी कैंसर की पुष्टि करने और उसके प्रकार की पहचान करने में महत्वपूर्ण होती है। इसके बाद बीमारी कितनी फैली है, यह जानने के लिए जरूरत के अनुसार MRI, अल्ट्रासाउंड, CT या PET-CT जैसी इमेजिंग जांचें की जा सकती हैं।
पेनाइल कैंसर में इमेजिंग जांच की भूमिका
इमेजिंग जांचों का उपयोग कैंसर की स्थानीय स्थिति और शरीर में उसके फैलाव का आकलन करने के लिए किया जा सकता है। MRI का उपयोग खासकर तब किया जा सकता है जब डॉक्टर को यह पता लगाना हो कि कैंसर लिंग के अंदर मौजूद गहरे ऊतकों या इरेक्टाइल टिश्यू तक पहुंचा है या नहीं। कुछ स्थितियों में MRI उपलब्ध न होने पर अल्ट्रासाउंड भी उपयोगी हो सकता है। CT और PET-CT का उपयोग कुछ मरीजों में कैंसर की स्टेजिंग के लिए किया जा सकता है। कौन-सी जांच जरूरी है, यह कैंसर की स्थिति, लिम्फ नोड्स की जांच और डॉक्टर के आकलन पर निर्भर करता है।
पेनाइल कैंसर में PET-CT क्या होता है?
PET-CT एक ऐसी इमेजिंग जांच है जिसमें PET और CT स्कैन को एक साथ किया जाता है। PET स्कैन में थोड़ी मात्रा में रेडियोएक्टिव ट्रेसर का उपयोग किया जाता है। कैंसर की कई कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं की तुलना में अधिक ग्लूकोज का उपयोग करती हैं, इसलिए कुछ कैंसर प्रभावित हिस्से PET स्कैन में अधिक सक्रिय दिखाई दे सकते हैं। CT स्कैन शरीर के अंदर मौजूद अंगों और ऊतकों की विस्तृत तस्वीरें देता है। दोनों जांचों को एक साथ करने से डॉक्टरों को शरीर में बीमारी की जगह और उसके संभावित फैलाव की जानकारी मिल सकती है।
पेनाइल कैंसर में PET-CT क्यों किया जाता है?
यह समझना जरूरी है कि PET-CT आमतौर पर लिंग में मौजूद प्राथमिक गांठ या घाव में कैंसर की पुष्टि करने वाली मुख्य जांच नहीं है। कैंसर की पुष्टि के लिए बायोप्सी महत्वपूर्ण होती है। PET-CT का उपयोग मुख्य रूप से कुछ मरीजों में कैंसर की स्टेजिंग के लिए किया जाता है। खासकर जब कमर की लिम्फ नोड्स में कैंसर फैलने का संदेह हो, तब PET-CT डॉक्टरों को शरीर के दूसरे हिस्सों में बीमारी की संभावित मौजूदगी का आकलन करने में मदद कर सकता है। 2026 की EAU गाइडलाइन के अनुसार, जिन मरीजों में लिम्फ नोड्स के शामिल होने की पुष्टि या मजबूत संदेह हो, उनमें PET-CT या CT के माध्यम से पेल्विस और दूर तक फैली बीमारी की स्टेजिंग की जा सकती है।
PET-CT से लिम्फ नोड्स में कैंसर का पता कैसे चलता है?
पेनाइल कैंसर लिम्फ सिस्टम के जरिए सबसे पहले कमर की लिम्फ नोड्स तक फैल सकता है और इसके बाद पेल्विक लिम्फ नोड्स तथा शरीर के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है। इसलिए लिम्फ नोड्स की जांच पेनाइल कैंसर की स्टेजिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। PET-CT कुछ मरीजों में ऐसी लिम्फ नोड्स या शरीर के अन्य हिस्सों को पहचानने में मदद कर सकता है जिनमें कैंसर होने की संभावना हो। हालांकि, बहुत छोटी लिम्फ नोड्स में मौजूद माइक्रोमेटास्टेसिस को PET-CT हमेशा नहीं पहचान सकता। इसलिए PET-CT का सामान्य परिणाम हर स्थिति में लिम्फ नोड्स में कैंसर की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं करता।
क्या PET-CT पेनाइल कैंसर की पुष्टि कर सकता है?
नहीं, PET-CT अकेले पेनाइल कैंसर की पुष्टि नहीं करता। PET-CT में किसी हिस्से में ज्यादा गतिविधि दिखाई देने का मतलब हमेशा कैंसर नहीं होता। संक्रमण और सूजन जैसी स्थितियों में भी PET ट्रेसर का अधिक अवशोषण दिखाई दे सकता है। इसीलिए कैंसर की पुष्टि के लिए डॉक्टर बायोप्सी और पैथोलॉजी रिपोर्ट को महत्वपूर्ण मानते हैं। PET-CT के परिणामों को मरीज के लक्षणों, शारीरिक जांच, बायोप्सी और अन्य इमेजिंग जांचों के साथ समझा जाता है।
पेनाइल कैंसर की स्टेजिंग
कैंसर की स्टेज से यह समझने में मदद मिलती है कि बीमारी कितनी फैली है। पेनाइल कैंसर की स्टेजिंग के लिए आमतौर पर TNM प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसमें T प्राथमिक ट्यूमर, N लिम्फ नोड्स और M शरीर के दूर के हिस्सों में कैंसर के फैलने को दर्शाते हैं। स्टेजिंग के लिए डॉक्टर शारीरिक जांच, बायोप्सी, MRI, अल्ट्रासाउंड, CT, PET-CT और लिम्फ नोड्स की जांच जैसी अलग-अलग जानकारी का उपयोग कर सकते हैं। सही स्टेज जानना इलाज की योजना बनाने में महत्वपूर्ण होता है।
पेनाइल कैंसर के लक्षण दिखने पर डॉक्टर से कब मिलें?
अगर लिंग पर कोई गांठ, घाव, छाला, त्वचा में बदलाव, खून आना, असामान्य स्राव या लगातार जलन हो और यह ठीक न हो रही हो, तो डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए। कमर में गांठ या सूजन दिखाई देने पर भी मेडिकल जांच जरूरी है, खासकर अगर इसके साथ लिंग पर कोई असामान्य बदलाव मौजूद हो। हर गांठ या घाव कैंसर नहीं होता, लेकिन लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय सही कारण की जांच करवाना बेहतर होता है।
मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में PET-CT
मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में कैंसर की जांच और स्टेजिंग में उपयोग होने वाली आधुनिक इमेजिंग सेवाएं उपलब्ध हैं। जब पेनाइल कैंसर में PET-CT की जरूरत होती है, तो यह जांच बीमारी की गतिविधि, लिम्फ नोड्स में संभावित फैलाव और शरीर के दूसरे हिस्सों में बीमारी की संभावना का आकलन करने में मदद कर सकती है। PET-CT की जरूरत हर मरीज में नहीं होती। डॉक्टर मरीज की बीमारी, बायोप्सी रिपोर्ट, लिम्फ नोड्स की स्थिति और अन्य जांचों को देखकर यह तय करते हैं कि PET-CT कब और किस उद्देश्य से किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
पेनाइल कैंसर एक दुर्लभ कैंसर है, जिसमें स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा सबसे आम प्रकार है। पेनाइल कैंसर के लक्षण में लिंग पर लंबे समय तक रहने वाला घाव, गांठ, त्वचा में बदलाव, खून आना, असामान्य स्राव या कमर में लिम्फ नोड्स की सूजन शामिल हो सकती है। पेनाइल कैंसर के कारण और जोखिम कारकों में HPV संक्रमण, तंबाकू का सेवन, फोरस्किन का बहुत तंग होना, बढ़ती उम्र और कुछ अन्य स्थितियां शामिल हो सकती हैं। पेनाइल कैंसर के प्रकार की पुष्टि आमतौर पर बायोप्सी और पैथोलॉजी जांच से की जाती है।
पेनाइल कैंसर में PET-CT का उपयोग मुख्य रूप से बीमारी की स्टेजिंग और लिम्फ नोड्स या शरीर के दूसरे हिस्सों में कैंसर के संभावित फैलाव का आकलन करने के लिए किया जाता है। यह प्राथमिक ट्यूमर की बायोप्सी का विकल्प नहीं है। मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में उपलब्ध आधुनिक इमेजिंग और डायग्नोस्टिक सेवाएं डॉक्टरों को जरूरत के अनुसार कैंसर की जांच और स्टेजिंग में सहायता कर सकती हैं। अगर आपको लिंग या कमर के आसपास कोई असामान्य बदलाव लंबे समय से दिखाई दे रहा है, तो समय पर डॉक्टर से सलाह लेकर उचित जांच करवाना जरूरी है।
Book tests, view reports, and manage your health records on the go. Experience convenient healthcare with Molecular Diagnostics and Therapy.