Dr. Nikunj Jain
Co-Founder and HOD - Nuclear Medicine ,MBBS, DRM, DNB, FEBNM, FANMB, Dip. CBNC
प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाला एक आम कैंसर है, जो प्रोस्टेट ग्रंथि में शुरू होता है। प्रोस्टेट एक छोटी-सी ग्रंथि होती है, जो मूत्राशय के ठीक नीचे होती है और वीर्य बनाने में मदद करती है। यह कैंसर ज्यादातर बढ़ती उम्र के पुरुषों में देखा जाता है। कई बार शुरुआती स्टेज में इसके कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए समय पर जांच करवाना और डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। प्रोस्टेट कैंसर हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। कुछ मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ता है, जबकि कुछ मामलों में तेजी से शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल सकता है। सही समय पर बीमारी की पहचान होने से डॉक्टर को इलाज की सही योजना बनाने में मदद मिलती है।
जब प्रोस्टेट ग्रंथि की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और उन पर शरीर का सामान्य नियंत्रण नहीं रहता, तो प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है। शुरुआत में कैंसर प्रोस्टेट तक सीमित रह सकता है, लेकिन आगे चलकर यह आसपास के ऊतकों, हड्डियों या शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकता है। इस बीमारी का असर कितना गंभीर होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर कितनी तेजी से बढ़ रहा है और किस स्टेज पर है। इसलिए हर मरीज की जांच और इलाज उसकी स्थिति के हिसाब से किए जाते हैं।
प्रोस्टेट कैंसर क्यों होता है, इसका एक निश्चित कारण अभी तक पता नहीं चला है। हालांकि, कुछ ऐसी चीजें हैं जिनसे इस बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। सबसे बड़ा जोखिम बढ़ती उम्र से जुड़ा है। आमतौर पर 50 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। अगर पिता या भाई जैसे परिवार के किसी करीबी सदस्य को यह कैंसर हो चुका है, तो दूसरे सदस्यों में भी इसका खतरा ज्यादा हो सकता है। कुछ लोगों में आनुवंशिक बदलाव, जैसे BRCA1 और BRCA2 जीन में बदलाव, भी प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, मोटापा और कुछ जीवनशैली से जुड़ी आदतें बीमारी के अधिक आक्रामक रूप से जुड़ी हो सकती हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी एक कारण यह साबित नहीं करता कि किसी व्यक्ति को कैंसर जरूर होगा।
प्रोस्टेट कैंसर के कई प्रकार होते हैं, लेकिन सबसे आम प्रकार एडेनोकार्सिनोमा है। यह प्रोस्टेट की उन कोशिकाओं में शुरू होता है जो वीर्य के तरल हिस्से को बनाने में मदद करती हैं। कुछ दुर्लभ मामलों में न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर या स्मॉल सेल कार्सिनोमा जैसे कैंसर भी हो सकते हैं। ये सामान्य प्रोस्टेट कैंसर से अलग तरीके से बढ़ सकते हैं और इनके इलाज की योजना भी अलग हो सकती है। कैंसर किस प्रकार का है, यह जानने के लिए डॉक्टर जांच और बायोप्सी की सलाह दे सकते हैं।
शुरुआती स्टेज में प्रोस्टेट कैंसर के कोई लक्षण दिखाई न देना भी आम बात है। जब लक्षण दिखने लगते हैं, तो व्यक्ति को बार-बार पेशाब आने, खासकर रात में कई बार उठने, पेशाब शुरू करने में परेशानी होने या पेशाब की धार कमजोर होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ लोगों को पेशाब करते समय दर्द या जलन महसूस हो सकती है। कभी-कभी पेशाब या वीर्य में खून भी दिखाई दे सकता है।
अगर कैंसर हड्डियों तक फैल गया हो, तो कमर, कूल्हों या हड्डियों में लगातार दर्द हो सकता है। कुछ मामलों में बिना किसी साफ वजह के वजन कम होना या बहुत ज्यादा थकान महसूस होना भी देखने को मिल सकता है। ध्यान रखें कि ये लक्षण प्रोस्टेट के बढ़ने या संक्रमण जैसी दूसरी समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे लक्षण होने पर कैंसर ही है। फिर भी, अगर परेशानी लगातार बनी हुई है, तो डॉक्टर से जांच करवाना बेहतर है।
प्रोस्टेट कैंसर का पता लगाने के लिए डॉक्टर मरीज की उम्र, लक्षण, परिवार में कैंसर का इतिहास और स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखते हैं। इसके बाद जरूरत के हिसाब से कुछ जांचें की जा सकती हैं। PSA ब्लड टेस्ट में खून के अंदर प्रोस्टेट-स्पेसिफिक एंटीजन नाम के पदार्थ का स्तर देखा जाता है। इसका स्तर बढ़ा होने पर प्रोस्टेट कैंसर की आशंका हो सकती है, लेकिन प्रोस्टेट का सामान्य से बड़ा होना या संक्रमण भी इसकी वजह हो सकता है। इसलिए केवल PSA टेस्ट के आधार पर कैंसर की पुष्टि नहीं की जा सकती।
डॉक्टर प्रोस्टेट की जांच के लिए शारीरिक परीक्षण भी कर सकते हैं। इसके अलावा, मल्टीपैरामीट्रिक MRI स्कैन से प्रोस्टेट के अंदर संदिग्ध हिस्सों को देखने में मदद मिलती है। अगर कैंसर की आशंका बनी रहती है, तो प्रोस्टेट बायोप्सी की जा सकती है। इसमें प्रोस्टेट से ऊतक का एक छोटा नमूना लेकर उसकी जांच की जाती है। बायोप्सी से कैंसर की पुष्टि करने और उसके ग्रेड का पता लगाने में मदद मिलती है। कुछ मरीजों में यह जानने के लिए कि कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैला है या नहीं, CT स्कैन, बोन स्कैन या PET-CT की सलाह दी जा सकती है।
PET-CT एक ऐसी इमेजिंग जांच है जिसमें शरीर के अंदर की गतिविधियों और अंगों की तस्वीरों को मिलाकर देखा जाता है। प्रोस्टेट कैंसर के कुछ मामलों में PSMA PET-CT का इस्तेमाल यह पता लगाने के लिए किया जाता है कि कैंसर प्रोस्टेट से बाहर फैला है या नहीं। इलाज के बाद कैंसर दोबारा होने की आशंका हो, तो भी डॉक्टर इस जांच की सलाह दे सकते हैं। हर मरीज को PET-CT करवाने की जरूरत नहीं होती। यह जांच कब जरूरी है, इसका फैसला कैंसर की स्टेज, पहले हुई जांचों और मरीज की स्थिति को देखकर डॉक्टर करते हैं।
मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में उपलब्ध डायग्नोस्टिक सेवाएं मरीजों को जरूरी जांचों के जरिए बीमारी का आकलन करने में मदद करती हैं। कौन-सी जांच उपयुक्त होगी, यह डॉक्टर की सलाह के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
प्रोस्टेट कैंसर का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर कितना बढ़ा है, उसकी ग्रेड क्या है और मरीज की उम्र व सेहत कैसी है। हर मरीज को एक ही तरह का इलाज देने के बजाय उसकी जरूरत के अनुसार योजना बनाई जाती है। अगर कैंसर शुरुआती स्टेज में है और धीरे बढ़ रहा है, तो डॉक्टर तुरंत इलाज शुरू करने के बजाय नियमित जांच के जरिए बीमारी पर नजर रखने की सलाह दे सकते हैं। इसे एक्टिव सर्विलांस कहा जाता है।
कुछ मरीजों में सर्जरी करके प्रोस्टेट ग्रंथि को निकाला जाता है। रेडिएशन थेरेपी में विशेष किरणों की मदद से कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने की कोशिश की जाती है। हार्मोन थेरेपी में उन हार्मोन के असर को कम किया जाता है जो कैंसर की वृद्धि में मदद कर सकते हैं। अगर कैंसर ज्यादा फैल गया है या पहले इलाज के बाद दोबारा हुआ है, तो डॉक्टर कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी या दूसरी दवाओं की सलाह दे सकते हैं। सही इलाज चुनने के लिए डॉक्टर से सभी विकल्पों, उनके फायदों और संभावित साइड इफेक्ट्स के बारे में बात करना जरूरी है।
प्रोस्टेट कैंसर को पूरी तरह रोकने का कोई पक्का तरीका नहीं है। फिर भी, संतुलित भोजन करना, नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखना और स्वस्थ वजन रखने की कोशिश करना अच्छी आदतें हैं। अगर परिवार में प्रोस्टेट कैंसर का इतिहास है या बीमारी को लेकर कोई चिंता है, तो डॉक्टर से बात करके यह समझें कि जांच कब और किस तरह करवानी चाहिए। पेशाब से जुड़ी परेशानी को लंबे समय तक नजरअंदाज न करें। समय पर डॉक्टर से सलाह लेने से समस्या का कारण समझने और जरूरत पड़ने पर सही जांच करवाने में मदद मिल सकती है।
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