Dr. Nikunj Jain
Co-Founder and HOD - Nuclear Medicine ,MBBS, DRM, DNB, FEBNM, FANMB, Dip. CBNC
IBD यानी आंतों में लंबे समय तक रहने वाली सूजन की बीमारी है। इसमें आंतों की अंदरूनी परत में सूजन और जलन हो सकती है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस। इस बीमारी में पेट दर्द, बार-बार दस्त, मल में खून, वजन कम होना, भूख कम लगना और कमजोरी जैसे लक्षण हो सकते हैं। कुछ लोगों में लक्षण हल्के होते हैं, जबकि कुछ लोगों में बीमारी काफी गंभीर हो सकती है।
IBD की सही स्थिति जानने के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों के साथ खून की जांच, मल की जांच, आंत की जांच और जरूरत पड़ने पर शरीर की तस्वीर लेने वाली जांचों की सलाह दे सकते हैं। मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में डॉक्टर की सलाह के अनुसार आधुनिक जांच सुविधाओं का लाभ लिया जा सकता है। CT एंटरोग्राफी भी ऐसी ही एक खास जांच है, जिससे खास तौर पर छोटी आंत को अच्छी तरह देखने में मदद मिलती है। इससे आंतों में सूजन और उससे जुड़ी कुछ दूसरी परेशानियों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
CT एंटरोग्राफी एक खास तरह की कंप्यूटर वाली जांच है, जिसमें छोटी आंत की साफ तस्वीरें ली जाती हैं। जांच से पहले मरीज को एक खास तरह का तरल पदार्थ पीने के लिए दिया जाता है। इससे छोटी आंत अच्छी तरह फैल जाती है और उसकी दीवार को तस्वीरों में साफ देखना आसान हो जाता है। कुछ मरीजों में नस के जरिए एक खास दवा भी दी जाती है, जिससे आंत और आसपास के हिस्से तस्वीरों में ज्यादा साफ दिखाई देते हैं। इसके बाद मरीज को एक मशीन पर सीधा लेटाया जाता है और मशीन शरीर के अंदर की तस्वीरें लेती है। इस जांच से केवल आंत के अंदर की सतह ही नहीं, बल्कि आंत की पूरी दीवार और उसके आसपास के हिस्सों को भी देखने में मदद मिलती है।
IBD में आंतों में होने वाली सूजन हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। कई बार केवल लक्षणों से यह पता लगाना मुश्किल होता है कि आंत का कौन-सा हिस्सा प्रभावित है और बीमारी कितनी बढ़ गई है। CT एंटरोग्राफी खास तौर पर छोटी आंत को देखने में मदद करती है। यह क्रोहन रोग में काफी उपयोगी हो सकती है, क्योंकि यह बीमारी छोटी आंत को भी प्रभावित कर सकती है। इस जांच से डॉक्टर को यह देखने में मदद मिल सकती है कि आंत में सूजन कहां है, बीमारी कितनी फैली हुई है और क्या इसके कारण कोई दूसरी परेशानी तो नहीं हो रही। बीमारी के बढ़ने या इलाज के दौरान स्थिति में बदलाव को समझने के लिए भी डॉक्टर जरूरत के अनुसार ऐसी जांच की सलाह दे सकते हैं।
इस जांच से छोटी आंत और उसके आसपास के हिस्सों में होने वाली कई परेशानियों को देखने में मदद मिल सकती है। इससे आंत में सूजन, खून बहना, आंत का रास्ता बंद होना, आंत के पास पस जमा होना और आंत के अलग-अलग हिस्सों के बीच असामान्य रास्ता बनने जैसी समस्याओं का पता लगाने में मदद मिल सकती है। कुछ मामलों में आंत में बनने वाली गांठ या दूसरी असामान्य बढ़त को देखने में भी यह जांच उपयोगी हो सकती है। क्रोहन रोग में डॉक्टर इस जांच की मदद से यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि बीमारी आंत के किस हिस्से में है और उससे जुड़ी कोई परेशानी तो नहीं हो रही।
IBD एक ऐसी बीमारी है जिसमें कभी लक्षण ज्यादा हो सकते हैं और कभी कम। कुछ समय तक मरीज को काफी राहत मिल सकती है, लेकिन बाद में बीमारी फिर बढ़ सकती है। ऐसे में केवल पेट दर्द या दस्त जैसे लक्षणों के आधार पर आंत की स्थिति का पूरा अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है। CT एंटरोग्राफी आंत की अंदरूनी स्थिति के साथ-साथ उसकी दीवार और आसपास के हिस्सों की जानकारी देने में मदद कर सकती है। इससे डॉक्टर को बीमारी की स्थिति समझने और आगे की जांच या इलाज की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, IBD का पता केवल CT एंटरोग्राफी से नहीं लगाया जाता। डॉक्टर आमतौर पर मरीज के लक्षण, जांच रिपोर्ट और जरूरत के अनुसार दूसरी जांचों को साथ देखकर फैसला लेते हैं।
इस जांच से पहले मरीज को कुछ समय तक खाना-पीना बंद रखने के लिए कहा जा सकता है। आमतौर पर जांच से लगभग चार घंटे पहले कुछ भी खाने या पीने से मना किया जा सकता है, लेकिन सही समय जांच केंद्र और डॉक्टर की सलाह के अनुसार अलग हो सकता है। जांच से पहले मरीज को एक खास तरल पदार्थ पीना होता है। इसकी मात्रा लगभग एक से डेढ़ लीटर तक हो सकती है और इसे कुछ समय में धीरे-धीरे पीने के लिए कहा जाता है। इससे छोटी आंत अच्छी तरह भर और फैल जाती है, जिससे तस्वीरें साफ आती हैं। अगर मरीज को पहले किसी खास दवा या जांच में दी जाने वाली दवा से एलर्जी हुई है, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी पहले ही देनी चाहिए। अगर किडनी की बीमारी, मधुमेह, थायरॉइड या कोई दूसरी स्वास्थ्य समस्या है, तो उसके बारे में भी डॉक्टर को बताना जरूरी है। महिलाओं को गर्भावस्था की संभावना होने पर जांच से पहले डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए।
जांच शुरू होने से पहले मरीज को खास तरल पदार्थ पीने के लिए दिया जाता है। इसे धीरे-धीरे पीने में लगभग एक घंटे तक का समय लग सकता है। इसका उद्देश्य छोटी आंत को अच्छी तरह भरना है। इसके बाद मरीज को जांच वाली मशीन की मेज पर सीधा लिटाया जाता है। मरीज को कुछ समय तक बिना हिले लेटे रहना होता है, ताकि तस्वीरें साफ आएं। जरूरत पड़ने पर नस में एक खास दवा दी जाती है। इसे देने के समय हल्की चुभन हो सकती है। दवा शरीर में जाने पर कुछ लोगों को थोड़ी देर के लिए गर्मी महसूस हो सकती है या मुंह में अजीब सा स्वाद आ सकता है। ये एहसास आमतौर पर थोड़े समय में ठीक हो जाते हैं। तस्वीर लेते समय मरीज को कुछ सेकंड के लिए सांस रोकने के लिए भी कहा जा सकता है। पूरी तस्वीर लेने की प्रक्रिया ज्यादा लंबी नहीं होती।
यह जांच आमतौर पर दर्द वाली जांच नहीं होती। जांच के दौरान मरीज को मशीन की मेज पर कुछ समय तक स्थिर रहना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी कई बार जांच से पहले दिए जाने वाले तरल पदार्थ की मात्रा के कारण हो सकती है। पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है या हल्की असहजता हो सकती है। अगर नस के जरिए दवा दी जाती है, तो सुई लगने के समय हल्की चुभन हो सकती है। दवा शरीर में जाने के बाद थोड़ी देर के लिए गर्मी महसूस होना सामान्य हो सकता है।
CT एंटरोग्राफी का एक बड़ा फायदा यह है कि इससे छोटी आंत की पूरी दीवार और उसके आसपास के हिस्सों को देखा जा सकता है। यह जांच आंत में सूजन, रुकावट, खून बहने, पस जमा होने और आंत के अलग-अलग हिस्सों के बीच असामान्य रास्ता बनने जैसी समस्याओं को देखने में मदद कर सकती है। इस जांच की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत तेज होती है। इसके अलावा पेट के दूसरे हिस्सों की भी तस्वीरें मिल सकती हैं, इसलिए डॉक्टर को आसपास के अंगों की स्थिति समझने में भी मदद मिल सकती है।
दोनों जांचों के तरीके और उनसे मिलने वाली जानकारी अलग होते हैं। आंत की कैमरे वाली जांच में एक पतली नली और कैमरे की मदद से बड़ी आंत के अंदर का हिस्सा सीधे देखा जाता है। जरूरत के अनुसार छोटी आंत के आखिरी हिस्से को भी देखा जा सकता है। वहीं CT एंटरोग्राफी में मशीन की मदद से छोटी आंत और उसके आसपास के हिस्सों की तस्वीरें ली जाती हैं। इससे आंत की पूरी दीवार और बाहर के आसपास के हिस्सों को देखने में मदद मिलती है। इसलिए दोनों जांचों का अपना अलग महत्व है। मरीज के लिए कौन-सी जांच जरूरी है, इसका फैसला डॉक्टर लक्षणों और बीमारी की स्थिति के अनुसार करते हैं।
छोटी आंत को देखने के लिए CT एंटरोग्राफी के अलावा MRI वाली जांच भी की जा सकती है। दोनों में जांच से पहले खास तरल पदार्थ पिलाया जा सकता है और दोनों से छोटी आंत की विस्तृत तस्वीरें मिल सकती हैं। मुख्य अंतर यह है कि CT एंटरोग्राफी में एक्स-रे किरणों का इस्तेमाल होता है, जबकि MRI वाली जांच में एक्स-रे किरणों का इस्तेमाल नहीं होता। अगर किसी मरीज को लंबे समय तक बार-बार छोटी आंत की जांच की जरूरत हो, तो डॉक्टर कुछ परिस्थितियों में MRI वाली जांच को पसंद कर सकते हैं। वहीं CT वाली जांच जल्दी पूरी हो जाती है और कुछ स्थितियों में यह बेहतर विकल्प हो सकती है। सही जांच का चुनाव मरीज की स्थिति के अनुसार किया जाता है।
CT एंटरोग्राफी आमतौर पर सुरक्षित जांच मानी जाती है, लेकिन इसमें एक्स-रे किरणों का इस्तेमाल होता है। इसलिए इसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही कराया जाना चाहिए। अगर नस के जरिए खास दवा दी जाती है, तो कुछ लोगों में हल्की प्रतिक्रिया हो सकती है। गंभीर एलर्जी बहुत कम होती है, लेकिन पहले कभी ऐसी दवा से एलर्जी हुई हो तो डॉक्टर को इसकी जानकारी देना जरूरी है। गर्भावस्था की संभावना होने पर भी डॉक्टर को पहले बताना चाहिए। डॉक्टर मरीज की स्थिति देखकर तय करते हैं कि जांच करना जरूरी है या कोई दूसरा विकल्प बेहतर रहेगा।
हर जांच की तरह CT एंटरोग्राफी की भी कुछ सीमाएं हैं। छोटी आंत में होने वाली कुछ बहुत शुरुआती समस्याएं, बहुत छोटी गांठें या कुछ प्रकार की रुकावट इस जांच में साफ दिखाई नहीं दे सकतीं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर दूसरी जांच की सलाह दे सकते हैं। कुछ मरीजों में MRI वाली जांच या आंत की कैमरे वाली जांच ज्यादा उपयोगी हो सकती है। इसलिए केवल एक जांच की रिपोर्ट के आधार पर बीमारी के बारे में अंतिम फैसला नहीं किया जाता। डॉक्टर मरीज के लक्षणों और दूसरी जांचों को भी ध्यान में रखते हैं।
जांच पूरी होने के बाद ली गई तस्वीरों को रेडियोलॉजी के डॉक्टर देखते हैं। वे तस्वीरों में दिखाई देने वाली बातों का अध्ययन करके रिपोर्ट तैयार करते हैं। यह रिपोर्ट उस डॉक्टर को दी जाती है जिसने जांच की सलाह दी है। अगर नस के जरिए दवा दी गई है, तो जांच के बाद कुछ समय तक केंद्र की सलाह के अनुसार रुकना पड़ सकता है। अगर जांच के बाद कोई असामान्य परेशानी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर या जांच केंद्र को बताना चाहिए। रिपोर्ट आने के बाद मरीज को उसे अपने डॉक्टर को दिखाना चाहिए। डॉक्टर रिपोर्ट को मरीज के लक्षणों और दूसरी जांचों के साथ देखकर आगे की सलाह देते हैं।
IBD हर मरीज में अलग तरह से दिखाई दे सकती है। किसी व्यक्ति में केवल पेट दर्द और दस्त हो सकते हैं, जबकि दूसरे व्यक्ति में आंत की सूजन के साथ रुकावट या दूसरी परेशानी भी हो सकती है। इसी वजह से बीमारी की सही स्थिति जानने के लिए एक से ज्यादा तरह की जांचों की जरूरत पड़ सकती है। डॉक्टर खून की जांच, मल की जांच, आंत की कैमरे वाली जांच और शरीर की तस्वीर लेने वाली जांचों को जरूरत के अनुसार चुनते हैं। CT एंटरोग्राफी खास तौर पर छोटी आंत को देखने में मदद करती है और क्रोहन रोग में बीमारी की जगह और उससे जुड़ी परेशानियों को समझने में उपयोगी हो सकती है।
IBD में छोटी आंत की स्थिति को समझने के लिए CT एंटरोग्राफी एक उपयोगी जांच हो सकती है। इससे आंत की सूजन, खून बहना, रुकावट, पस जमा होना और आंत के अलग-अलग हिस्सों के बीच असामान्य रास्ता बनने जैसी समस्याओं को देखने में मदद मिल सकती है। खासकर क्रोहन रोग में यह जांच बीमारी की जगह और उसकी स्थिति को समझने में डॉक्टर की मदद कर सकती है।
हालांकि, हर मरीज के लिए CT एंटरोग्राफी जरूरी नहीं होती। डॉक्टर मरीज के लक्षण, बीमारी की स्थिति और पहले से हुई जांचों को देखकर तय करते हैं कि कौन-सी जांच सबसे उपयोगी रहेगी। मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में डॉक्टर की सलाह के अनुसार आधुनिक जांच सुविधाओं का लाभ लिया जा सकता है, जिससे IBD जैसी आंतों से जुड़ी समस्याओं की स्थिति को समझने और आगे की देखभाल की सही योजना बनाने में मदद मिल सके।
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