Dr. Nikunj Jain
Co-Founder and HOD - Nuclear Medicine ,MBBS, DRM, DNB, FEBNM, FANMB, Dip. CBNC
ब्लड कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो खून, बोन मैरो या शरीर के लिंफैटिक सिस्टम को प्रभावित करती है। इसमें असामान्य कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं और शरीर में स्वस्थ रक्त कोशिकाओं के सामान्य काम को प्रभावित कर सकती हैं। इसकी वजह से शरीर की संक्रमण से लड़ने, ऑक्सीजन पहुंचाने और खून का बहाव रोकने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
ब्लड कैंसर के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। कुछ मामलों में बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है, जबकि कुछ में जल्दी इलाज की जरूरत पड़ सकती है। समय पर जांच कराने से बीमारी को समझने और सही इलाज की योजना बनाने में मदद मिलती है।मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में PET-CT जैसी जांचें डॉक्टरों को कुछ प्रकार के ब्लड कैंसर का आकलन करने में मदद कर सकती हैं, जब इनकी जरूरत चिकित्सकीय रूप से हो।
ब्लड कैंसर क्या है?
ब्लड कैंसर तब होता है जब खून बनाने वाली कोशिकाओं या इम्यून सिस्टम की कुछ कोशिकाओं में बदलाव आ जाता है और वे अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं। ये असामान्य कोशिकाएं बोन मैरो, लिंफ नोड्स, तिल्ली और शरीर के दूसरे हिस्सों को प्रभावित कर सकती हैं। दूसरे कई कैंसरों के विपरीत, ब्लड कैंसर में हमेशा कोई ठोस गांठ नहीं बनती। हालांकि, कुछ प्रकार के ब्लड कैंसर में गर्दन, बगल या जांघ के पास लिंफ नोड्स में सूजन दिखाई दे सकती है। बीमारी का प्रकार, उसकी गति और शरीर के प्रभावित हिस्से यह तय करते हैं कि मरीज को कौन-से लक्षण हो सकते हैं और किस तरह की जांच की जरूरत होगी।
ब्लड कैंसर के मुख्य प्रकार कौन-से हैं?
ब्लड कैंसर को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मल्टीपल मायलोमा। ये तीनों अलग-अलग कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं।
1. ल्यूकेमिया
ल्यूकेमिया आमतौर पर बोन मैरो में शुरू होता है, जहां खून की कोशिकाएं बनती हैं। इसमें असामान्य सफेद रक्त कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं और स्वस्थ कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसके कारण थकान, बार-बार संक्रमण, बुखार या आसानी से खून बहने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
2. लिम्फोमा
लिम्फोमा इम्यून सिस्टम की लिम्फोसाइट नामक कोशिकाओं में विकसित होता है। यह अक्सर लिंफ नोड्स को प्रभावित करता है, लेकिन शरीर के दूसरे अंगों में भी फैल सकता है। हॉजकिन लिम्फोमा और नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा इसके दो प्रमुख प्रकार हैं। इनकी पहचान और इलाज बीमारी के उपप्रकार के अनुसार किया जाता है।
3. मल्टीपल मायलोमा
मल्टीपल मायलोमा प्लाज्मा कोशिकाओं में विकसित होता है। ये कोशिकाएं सामान्य रूप से संक्रमण से लड़ने में मदद करती हैं। इस बीमारी में असामान्य प्लाज्मा कोशिकाएं बोन मैरो में जमा हो सकती हैं और हड्डियों, किडनी तथा स्वस्थ रक्त कोशिकाओं को प्रभावित कर सकती हैं। हड्डियों में दर्द, कमजोरी और बार-बार संक्रमण इसके संभावित लक्षण हैं।
ब्लड कैंसर के लक्षण क्या हैं?
ब्लड कैंसर के लक्षण बीमारी के प्रकार और उसकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। शुरुआत में कुछ लोगों को बहुत कम लक्षण महसूस होते हैं, जबकि दूसरों में कई बदलाव एक साथ दिखाई दे सकते हैं। लगातार थकान, कमजोरी, बार-बार संक्रमण होना, बिना किसी स्पष्ट कारण के बुखार आना, आसानी से चोट लगना और असामान्य रक्तस्राव इसके संभावित लक्षण हैं। कुछ मरीजों में गर्दन, बगल या जांघ के पास गांठ या सूजन दिखाई दे सकती है।
इसके अलावा, बिना कोशिश के वजन कम होना, रात में बहुत पसीना आना, भूख कम लगना और पेट में भारीपन भी हो सकता है। मल्टीपल मायलोमा में पीठ या पसलियों में लगातार दर्द और हड्डियों के कमजोर होने की समस्या हो सकती है। इन लक्षणों का मतलब हमेशा ब्लड कैंसर नहीं होता। संक्रमण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं में भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। फिर भी, यदि लक्षण लगातार बने रहें या बढ़ने लगें, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
ब्लड कैंसर का पता कैसे लगाया जाता है?
ब्लड कैंसर की जांच मरीज के लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और डॉक्टर की सलाह के आधार पर की जाती है। सबसे पहले CBC यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट जैसी जांच की जा सकती है। इससे लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स की संख्या का पता चलता है। ब्लड स्मीयर टेस्ट में खून की कोशिकाओं को माइक्रोस्कोप से देखा जाता है। कुछ मामलों में बोन मैरो एस्पिरेशन या बायोप्सी की जरूरत पड़ सकती है। यदि लिम्फोमा का संदेह हो, तो लिंफ नोड की बायोप्सी बीमारी की पुष्टि करने में मदद कर सकती है। फ्लो साइटोमेट्री, इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री और जेनेटिक टेस्ट भी कैंसर के प्रकार की पहचान करने में उपयोगी हो सकते हैं। डॉक्टर जरूरत के अनुसार CT, MRI या PET-CT जैसी इमेजिंग जांच भी सुझा सकते हैं। हर मरीज को सभी जांचों की जरूरत नहीं होती।
ब्लड कैंसर में PET-CT स्कैन की क्या भूमिका है?
PET-CT एक आधुनिक इमेजिंग जांच है, जिसमें पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (PET) और कंप्यूटेड टोमोग्राफी (CT) को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। कई कैंसर की जांच में FDG नाम का रेडियोएक्टिव ट्रेसर उपयोग किया जाता है, जिससे शरीर के उन हिस्सों की पहचान करने में मदद मिलती है जहां ग्लूकोज का इस्तेमाल अधिक हो रहा हो। CT शरीर के अंदर की संरचनाओं की तस्वीरें देता है। PET-CT खासकर कई प्रकार के लिम्फोमा के मूल्यांकन में उपयोगी हो सकता है। इससे बीमारी कितनी फैली है, कौन-से लिंफ नोड्स या अंग प्रभावित हो सकते हैं और इलाज के बाद बीमारी की गतिविधि में कितना बदलाव आया है, इसका आकलन करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, PET-CT हर प्रकार के ब्लड कैंसर के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं है। ल्यूकेमिया और मल्टीपल मायलोमा के कुछ मामलों में दूसरी जांचें अधिक उपयुक्त हो सकती हैं। संक्रमण और सूजन के कारण भी स्कैन में असामान्य गतिविधि दिखाई दे सकती है। इसलिए PET-CT की रिपोर्ट को मरीज के लक्षणों, बायोप्सी और अन्य जांचों के साथ समझना जरूरी है। यह जांच बायोप्सी या कैंसर की पुष्टि करने वाले दूसरे जरूरी टेस्ट का विकल्प नहीं है।
मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में ब्लड कैंसर की इमेजिंग
मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में PET-CT जैसी डायग्नोस्टिक इमेजिंग सेवाएं उपयुक्त मामलों में बीमारी का मूल्यांकन करने में मदद कर सकती हैं। डॉक्टर मरीज की स्थिति, कैंसर के प्रकार और जांच के उद्देश्य के आधार पर सही इमेजिंग टेस्ट की सलाह देते हैं। यदि आपको PET-CT स्कैन कराने की सलाह दी गई है, तो अपनी पुरानी रिपोर्ट, बायोप्सी के परिणाम और इलाज से जुड़ी जानकारी साथ रखें। इससे मेडिकल टीम को आपकी स्थिति समझने में मदद मिलती है।
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